Friday, 21 October 2011

मेरी कविता:-हाँ तुम मुर्दा हो गए हो .....

हाँ तुम मुर्दा हो गए हो .....
 
 क्या तुम बहरे हो
जो नही सुनाई पड़ती चीखें
उन बेबस और लाचारों की
जिन पर जोर जुल्म ढाया जा रहा है ।
क्या तुम अंधे हो
जो नही दिखाई पड़ता है अत्याचार
लूट ,हत्या ,अपहरण और बलात्कार
जो अक्सर तुम्हारे सामने हो रहा है
क्या तुम लुल्हे हो
जो नही करते हो प्रहार
उन कारणों के खिलाफ
जो तुम्हारा सुख चैन लूट रहा है
क्या तुम गूंगे हो
जो नही करते हो प्रतिकार
उन जालिमों के खिलाफ
जो तुम्हारा सपना मिटा रहा है
तुम अंधे, बहरे, लुल्हे और गूंगे ही नहीं
हाँ तुम मुर्दा हो गए हो
जो चुप चाप सह रहे हो
ये सारा भ्रष्टाचार  ......


  

मेरी कविता :- विडम्बना

 विडम्बना 

लोग मानते हैं कि
भगवान की मर्जी बगैर
एक पत्ता भी नहीं हिलता
पर मैं नहीं मानता
रोज़ बहुत कुछ
ऐसा होता है
जिसे भगवान तो क्या
भला आदमी भी पसंद नहीं करता ।


चोर उचक्के अमीर बन रहे हैं
अच्छे भले फटेहाल हो रहे हैं
काली करतूत वाले सफेदपोश बनकर
सत्ता से मौज उड़ा रहे हैं ।
बच्चे अनाथ हो रहे हैं
औरतों की मांगे सुनी हो रही हैं
बलात्कार, अपहरण , हत्या, तो सरेआम है
कुव्यवस्था की हद हो गई है ।
फिर भी लोग कह रहे हैं
भगवान की इच्छा के बिना
कोई कुछ भी नहीं कर सकता 


है कोई जो कह सके मेरे अलावा ?
या तो इस कथन में दम नहीं
या फिर कोई भगवान नहीं......

        -राघवेन्द्र सिंह कुशवाहा